सुनो भाई उधो
लहरबुंदिया
-परमानंद वर्मा
यही वजह है कि जिस तरह सुआ जिसे मीट्ठू भी कहा जाता है उसके मीठे बोल और सुंदर व आकर्षक रुप के कारण पिंजरे में कैद कर लिया जाता है, इतना ही नहीं खाने के लिए लाल मिर्च भी उसे परोसा जाता है। यही हाल इस युवती का भी हुआ। बाचालपना जिसे छत्तीसगढी में लपरही कहा जाता है उसके कारण वह कई लोगों के फंदे में फंस जाती है। इस दुर्गुण ने उसे कहीं का नहीं रखा। उसे घर छोडकर मायका जाना पडा। इसी संदर्भ में पढिये यह छत्तीसगढी रचना…।
रेखा, वैजंतीमाला, हेमामालिनी, साधना, माधुरी दीक्षित अउ मुमताज जइसे सुंदरी, अप्सरा अउ अभिनेत्री सिरिफ नगर अउ महानगर मं ही नइ जनम लेवय। गांव मन मं एकर मन ले बढ़के एक रूपसी मन जनम लेथें। ओमन मीडिया अउ फिल्मी दुनिया मं आ जथे तब अइसे चंदा बरोबर चमक जथे के चौदहवीं के चांद, उही मन भर हे। गांव के ये रूपसी मन ला कहूं ओमन देख परहीं त आंखी पटपटा जही, कइहीं- गांव मन मं घला अइसनो हीरा जगमगाथे। कमी अतके हे के येमन गरीब, गरीब नइते बड़े इज्जतदार, मालधनी परिवार के बेटी, बहिनी अउ गोसइन होथे।
रूप के रानी, सुंदरी अउ अप्सरा के बात निकलगे तब सुरता आगे मोर गांव के, गजब सुंदर, मोहनी, हंसमुख चेहरा गोठियावय, बोलय तब अइसे लगय जइसे ओकर मुंह ले मधुरस टपकत हे। आंखी तो अइसे जइसे हिरनी के आंखी ओकर आघू मं फेल खा जतिस। कद, काठी, नाक, मुंह, कान, छाती मुडी के बनावट अइसे जइसे देखते-देखत रहि जते, एकर संग एक घौं गोठिया बता लेतेंव का।
छोटे परिवार मं बिहाव होके के आय रिहिसे, गोसइयां ओकर आढ़त के काम करय, धान खरीदी अउ बेच के चुकारा देना लेना ओकर धंधा राहंय। इही पाके दसों झन के ओकर घर म आना-जाना रहय। सब ओला भउजी-भउजी काहय अउ पटा घला लेवत रिहिन हे। ओ अढ़तिया के एको झन संतान नइ रिहिसे। तीन-चार झन डउकी बना के लान डरे रिहिसे फेर एको झन टिक नइ पावत रिहिन हे।
परेशान राहय, काबर नइ होवत हे संतान कहिके। बहुत देखइस-सुनइस, इलाज पानी करइस फेर करम-किसमत मं राहय तब न कोनो संतान होवय। कोनो-कोनो किहिन, एक झन अउ डउकी बना के देख ले आखिरी बार, एकरो ले कोनो नइ होही तहां ले तियाग देबे।
अबके बार जउन डउकी बनाके लइस तउन तो पहिली लाय डउकी मन ले गजबे के सुंदर रिहिसे, पुतरी बरोबर चक-चक ले सुंदर, वाजिब मं एहर ‘चौदहवीं के चांद ले कोनो परकार के कम नइ रिहिसे। एकर नांव रिहिसे ‘लहरबुंदिया। जब रेंगय, आवय-जावय तब देखइया के करम छाड़य जउन ओला देखे बिगर नइ राहत रिहिन होही। ये रूप के रानी लहरबुंदिया ला देखके सबके मुंह मं पानी आ जात रिहिसे। फेर गरीब के गोसाइन रिहिसे, कहिथे नहीं- गरीब के लुगई सबके भउजई होथे तइसे कस हाल होय बिगन नइ रिहिसे।
गांव के इसकुल करा कुंआ रिहिसे तिहां संझा-बिहनिया पानी भरे ले आवय। हंसमुख बानी के लहरबुंदिया अतेक चंचल सुभाव के रिहिसे के ककरो संग गोठियाय बिगन नइ रेहे सकत रिहिसे। एकरे सेती कतको झन संग फंस गे रिहिसे, अइसे ओकर गोसइया अढ़तिया हा संका करय। इही बात ल लेके ओला कई घौं ठठा घलो डरिस। फेर कतको झन अइसन कुटही आदत सुभाव के होथे, कतको मार-गारी खांही, बेशरम पर जाय रहिथे। कांही फरके नइ परय। ‘कुकुर भुंके हजार, हाथी चले बजार कस अपने रस्दा मं चलत रहिथे।
गांव मं मोर ददा के नानकिन किराना के दुकान रिहिसे। संझा कन ओहर समान खरीदे ले आवय तब महीं सपड़ौं। समान लेये के बेरा आनी-बानी के मजाक करय। मंय कांही धियान नइ दौं, अनसुना कर दौं तब काहय- तैं निच्चट लेड़गा हस का बाबू, बिन गतर के हस का? कुछु मय नई गोठियातेंव तहां ले ओहर समान धरय अउ चल दय।
एक दिन का होइस, अढ़तिया ककरो संग ओला रंगे हाथ पकड़ लिस। नंगत के ठठइस, होश गरम कर दीस। बिहान भर अढ़तिया धान खरीदी करे बर निकलगे। एती मौका पाके लहरबुंदिया अपन लुगरा, कपड़ा, रुपया-पइसा धरिस अउ भाग के जात रिहिसे। उही दिन का होइस, ददा हा मोला अपन पेट दरद के दवा लाने खातिर देवादा गांव भेज दीस।
साइकिल मं सपाटा मारत पहलवान असन अकोली बगीचा करा पहुंचे रेहेंव तब ये लहरबुंदिया सपड़ा लिस। ये बाबू रुक तो थोकिन, कहां जावत हस कहिके रुकवा लीस। मैं भल ल भल जानेंव। ओहर बताथे- जान दे बाबू, ओ अढ़तिया हा न काली रात के गजब के ठठाय हे, सिहरगे हौं तेकर सेती भाग के जाथौं नइ राहौं ओ गड़ौना करा।
पूछथौं- तब काबर मारिस हे ओ तोला अढ़तिया हा?
ओहर बताथे- जान दे बाबू, ओ गउंटिया संग मोला सपड़ा लीस। गारी-गुफ्तार लगावत अस मरई मारिस ते तोला का बतावौं?
-अनीत करबे तब नइ मार खाबे, अइसने भला कोनो गलत काम करही?
मोर बात ल अनसुना करत पूछथे- तैं कहां जाथस बाबू?
– बतायेंव, देवादा जाथौं डॉक्टर करा दवई लाय बर, ददा हा भेजे हे।
-महूं ल बइठार लेना बाबू, ओती सांकरा गाँव करा बस पकड़ के अहिवारा जाहूं, उहें मोर मइके हे।
केहेंव- नइ बइठारौं भई।
लहरबुंदिया मोर हाथ ला जबरदस्ती पकड़ लीस अउ खींच के अपन छाती ले लगा लीस अउ किहिस- कब के तोर ऊपर मोर नजर गड़े रिहिसे, आज मन पूरा कर दे।
केहेंव- तोला शरम नइ लागय, अतेक नीच काम अउ मोर से करवाना चाहत हस?
जोर से झटका देके ओकर ले अपन परान बचायेंव अउ साइकिल धर के ओकर तीर ले मुक्ति पायेंव।
ओहर कहिथे- हत रे कहां के लेड़गा-कोंदा अउ बिन्सुल के नइतो। निच्चट हस, कांही ला नइ जानस तइसे लागथे।
ओहर हांसते-मुसकुरावत रहिगे, मंय उड़नछू होगेंव चिरई बरोबर।
