रायपुर। जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक साधना काल चातुर्मास 2026 इस वर्ष 29 जुलाई से प्रारंभ होगा। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जैन साधु-साध्वियां एक ही स्थान पर निवास कर आत्मसाधना, स्वाध्याय, तप, त्याग और धर्म प्रभावना के माध्यम से समाज को संयम, सदाचार और नैतिक जीवन का संदेश देंगे।
इस दौरान जैन मंदिरों, स्थानकों और उपाश्रयों में धार्मिक आराधनाओं, प्रवचनों और संस्कारमय कार्यक्रमों का विशेष आयोजन किया जाएगा। श्रद्धालु भी इस अवधि में व्रत, तप और आत्मचिंतन के माध्यम से अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करेंगे।
अहिंसा और आत्मसाधना का विशेष काल
श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि जैन आगमों में चातुर्मास का विशेष महत्व बताया गया है। वर्षा ऋतु में जमीन पर अनेक सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है, इसलिए अहिंसा के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए जैन साधु-साध्वियां इस अवधि में लगातार विहार नहीं करते।
चातुर्मास के दौरान साधु-साध्वियां एक निश्चित स्थान पर रहकर—
- धर्म प्रवचन करते हैं।
- स्वाध्याय और ध्यान करते हैं।
- तप और साधना में समय बिताते हैं।
- समाज को नैतिक जीवन की प्रेरणा देते हैं।
आगमिक परंपरा के अनुसार साधु-साध्वियां इस अवधि में शहर सीमा से लगभग चार कोस (करीब 10 किलोमीटर) की निर्धारित सीमा से बाहर नहीं जाते।
केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, जीवन सुधार का अभियान
श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने कहा कि चातुर्मास केवल संतों के स्थिर निवास की परंपरा नहीं है, बल्कि यह समाज के आध्यात्मिक जागरण का चार माह का अभियान है।
इस दौरान विभिन्न धार्मिक गतिविधियां आयोजित होती हैं—
- प्रतिदिन प्रवचन।
- सामायिक और प्रतिक्रमण।
- जप और ध्यान।
- आयंबिल।
- उपवास।
- एकासन।
- पौषध।
- भक्ति और आराधना।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु त्याग और संयम का संकल्प लेकर अपने व्यवहार और जीवनशैली में सुधार का प्रयास करते हैं।
वर्तमान समय में बढ़ा चातुर्मास का महत्व
आज के दौर में भौतिक प्रतिस्पर्धा, तनाव और उपभोक्तावाद के बीच चातुर्मास व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण और अनुशासन की राह दिखाता है।
यह पर्व लोगों को—
- संयमित जीवन।
- सादगी।
- जीवदया।
- पर्यावरण संरक्षण।
- नैतिक मूल्यों।
- पारिवारिक संस्कारों।
से जोड़ने का अवसर देता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक तनाव और सामाजिक बदलाव के इस दौर में चातुर्मास का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
सात्विक भोजन और त्याग की परंपरा
चातुर्मास में सात्विक जीवनशैली अपनाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इस दौरान कई श्रद्धालु खान-पान में संयम रखते हैं।
कई लोग इनका पालन करते हैं—
- जमीकंद (आलू, प्याज, लहसुन, अदरक आदि) का त्याग।
- गरिष्ठ भोजन से दूरी।
- बाजार के बने खाद्य पदार्थों से परहेज।
- विशेष दिनों में हरी सब्जियों और फलों का त्याग।
इसके अलावा श्रद्धालु एकासन, उपवास, आयंबिल, पौषध, सामायिक और प्रतिक्रमण जैसी आराधनाएं करते हैं।
आयंबिल और उपवास की विशेष साधना
आयंबिल में नमक, तेल, घी, मसाले और स्वाद बढ़ाने वाले पदार्थों का त्याग कर बेहद सादा भोजन किया जाता है।
वहीं उपवास के दौरान कई श्रद्धालु केवल उबला हुआ जल ग्रहण करते हैं और सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करते।
यह साधना शरीर के साथ मन को भी अनुशासित करने का माध्यम मानी जाती है।
चातुर्मास के प्रमुख पर्व
चातुर्मास के चार महीनों में कई महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व मनाए जाएंगे।
प्रमुख तिथियां—
- 29 जुलाई: चातुर्मास प्रारंभ
- 8 सितंबर: पर्यूषण महापर्व प्रारंभ (श्वेतांबर परंपरा)
- 15 सितंबर: संवत्सरी महापर्व एवं दशलक्षण पर्व प्रारंभ
- 25 सितंबर: अनंत चतुर्दशी
- 18 अक्टूबर: नवपद आयंबिल ओली प्रारंभ
- 9 नवंबर: भगवान महावीर का 2553वां निर्वाण कल्याणक
- 10 नवंबर: गौतम प्रतिपदा एवं वीर निर्वाण संवत् 2553 का शुभारंभ
- 14 नवंबर: ज्ञान पंचमी
- 24 नवंबर: चातुर्मास पूर्णाहुति
इनके अलावा संतों की जन्म जयंती, पुण्यतिथि, धार्मिक संगोष्ठियां, संस्कार शिविर, युवा सम्मेलन और महिला सम्मेलन जैसे कार्यक्रम भी आयोजित होंगे।
देशभर में हजारों साधु-साध्वियां करेंगे धर्म प्रभावना
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की जानकारी के अनुसार वर्ष 2026 में श्रमण संघ के आचार्य डॉ. शिवमुनि की आज्ञा में बड़ी संख्या में साधु-साध्वियों के चातुर्मास निर्धारित हैं।
संघ के अनुसार—
- 78 साधुओं का चातुर्मास।
- 284 साध्वियों का चातुर्मास।
- कुल 362 चातुर्मास निर्धारित हैं।
देश की प्रमुख जैन परंपराओं—स्थानकवासी, मूर्तिपूजक, तेरापंथ और दिगंबर—को मिलाकर 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियां धर्म, शिक्षा, संस्कार, अहिंसा और सामाजिक जागरण का कार्य कर रहे हैं।
संयम, संस्कार और आत्मशुद्धि का संदेश
चातुर्मास 2026 समाज को केवल धार्मिक गतिविधियों से नहीं जोड़ता, बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर झांकने, गलत आदतों को छोड़ने और बेहतर जीवन मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है। चार महीने का यह आध्यात्मिक काल संयम, संस्कार और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर माना जाता है।
