छत्तीसगढ़ के बस्तर में लंबे समय तक नक्सल हिंसा और IED विस्फोटों का दंश झेलने वाले लोगों के लिए सरकार ने बड़ी पहल की है। उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि सरकार अब केवल बस्तर को IED के भय से मुक्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों के जीवन को भी आसान बनाने का प्रयास कर रही है, जिन्होंने इन विस्फोटों में अपने हाथ-पैर गंवाए हैं।
इसी उद्देश्य से बस्तर संभाग में दो चरणों में विशाल निःशुल्क दिव्यांग सेवा शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। इन शिविरों में जरूरत के अनुसार कृत्रिम हाथ-पैर, जयपुर फुट, कैलिपर्स और अन्य सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाएंगे।
जगदलपुर और दंतेवाड़ा में लगेंगे शिविर
सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार पहला शिविर 5 से 7 अक्टूबर तक जगदलपुर में आयोजित किया जा रहा है। इसमें बस्तर संभाग के चार जिलों के दिव्यांगजन लाभ ले सकेंगे।
वहीं दूसरा शिविर 15 से 17 अक्टूबर तक दंतेवाड़ा में लगाया जाएगा। इसमें दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर जिले के हितग्राहियों को सहायता दी जाएगी।
शिविरों में भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति, जयपुर के तकनीकी सहयोग से दिव्यांगजनों की जरूरत के अनुसार कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण तैयार किए जाएंगे।
किन जिलों के लोग ले सकेंगे लाभ?
जगदलपुर शिविर में:
- बस्तर
- कांकेर
- नारायणपुर
- कोंडागांव
दंतेवाड़ा शिविर में:
- दंतेवाड़ा
- सुकमा
- बीजापुर
जगदलपुर शिविर के लिए 2,953 दिव्यांग चिन्हांकित
जगदलपुर में आयोजित होने वाले पहले शिविर के लिए चार जिलों में कुल 2,953 दिव्यांगजनों को चिन्हांकित किया गया है।
जिलेवार आंकड़ों के मुताबिक:
- बस्तर: 1,570
- कोंडागांव: 1,080
- कांकेर: 236
- नारायणपुर: 67
इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिविर में बड़ी संख्या में जरूरतमंद लोगों को सहायता मिलने की संभावना है।
IED विस्फोटों में हाथ-पैर गंवाने वालों को प्राथमिकता
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि IED किसी व्यक्ति की पहचान नहीं करता था। इसकी चपेट में सुरक्षाबलों के जवानों के साथ आम नागरिक और पशु भी आते रहे हैं।
कई नागरिकों ने इन विस्फोटों में अपने हाथ या पैर गंवा दिए। हादसे के बाद उनकी जान तो बच गई, लेकिन दिव्यांगता के कारण उन्हें वर्षों तक रोजमर्रा की जिंदगी में मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
अब सरकार ऐसे लोगों तक पहुंचकर उनकी जरूरत के मुताबिक सहायता देने की कोशिश कर रही है।
IED विस्फोट से दिव्यांग हुए लोगों को विशेष प्राथमिकता दी जाएगी।
जरूरत के अनुसार उन्हें:
- कृत्रिम पैर यानी जयपुर फुट
- कृत्रिम हाथ
- कैलिपर्स
- व्हीलचेयर
- ट्राइसाइकिल
- बैसाखी
- स्मार्ट छड़ी
- वॉकिंग स्टिक
- श्रवण यंत्र
- अन्य सहायक उपकरण
दिए जाएंगे।
पुराने कृत्रिम अंगों की भी होगी मरम्मत
शिविर में केवल नए कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने की व्यवस्था ही नहीं होगी, बल्कि पुराने या क्षतिग्रस्त कृत्रिम अंगों की मरम्मत की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाएगी।
विशेषज्ञ दिव्यांगजनों की जांच करेंगे और जरूरत के मुताबिक उनका नाप लेकर कृत्रिम अंग तैयार करने की प्रक्रिया पूरी करेंगे।
इससे उन लोगों को भी राहत मिलेगी, जिनके पास पहले से कृत्रिम अंग हैं लेकिन वे खराब या उपयोग के लायक नहीं रह गए हैं।
अन्य दिव्यांगजन भी ले सकेंगे लाभ
शिविर केवल IED पीड़ितों के लिए नहीं है। अन्य कारणों से दिव्यांग हुए लोग भी यहां पहुंचकर अपनी जरूरत के अनुसार सहायक उपकरण प्राप्त कर सकेंगे।
समाज कल्याण विभाग के सहयोग से अलग-अलग श्रेणी के दिव्यांगजनों के लिए आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था की जा रही है।
इस पहल का उद्देश्य बस्तर के दूरदराज इलाकों में रहने वाले दिव्यांगजनों को उनके जिले और संभाग स्तर पर ही जरूरी सहायता उपलब्ध कराना है।
ग्राम पंचायत से जिला स्तर तक पंजीयन
सरकार ने शिविर में पहुंचने वाले हितग्राहियों के पंजीयन के लिए ग्राम पंचायत से लेकर जिला स्तर तक व्यवस्था की है।
दिव्यांगजन अपने जिले के:
- कलेक्टर
- पुलिस अधीक्षक
- जिला पंचायत CEO
- जनपद पंचायत CEO
से संपर्क कर सकते हैं।
इसके अलावा ग्राम सभाओं के माध्यम से भी जरूरतमंद लोगों की पहचान की जा रही है। ग्राम पंचायत सचिवों के जरिए नामों का पंजीयन कर उन्हें जनपद और जिला पंचायत स्तर तक भेजने की व्यवस्था की गई है।
पंजीयन नहीं हुआ तो भी पहुंचें
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर किसी जरूरतमंद व्यक्ति का पहले पंजीयन नहीं हो पाया है, तो वह सीधे शिविर में पहुंच सकता है।
शिविर में आने वाले हितग्राहियों के भोजन और ठहरने की व्यवस्था भी किए जाने की जानकारी दी गई है।
‘IED मुक्त बस्तर’ के साथ पीड़ितों की मदद का संकल्प
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि सरकार का लक्ष्य बस्तर को IED के भय से मुक्त करने के साथ-साथ उन परिवारों और लोगों के साथ खड़ा होना भी है, जिन्होंने इस हिंसा की कीमत चुकाई है।
सरकार का प्रयास है कि बस्तर के किसी भी ऐसे व्यक्ति तक सहायता पहुंचे, जिसने IED विस्फोट में अपना अंग गंवाया है और आज भी उसके कारण कठिन जीवन जी रहा है।
दोनों शिविरों के जरिए ऐसे लोगों की पहचान, जांच और जरूरत के अनुसार कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा।
बस्तर में IED का दंश खत्म करने के साथ अब उन पीड़ितों के जीवन में भी नई उम्मीद जगाने की कोशिश की जा रही है।
