कइयों ने कई कई बार लिखा ,क्या और तुम लिख पाओगे ।
परिपूर्णता की बात छोड़ो, रिक्तिता समझ ना पाओगे ।।
लिखा ना जाता “प्रेम” गरल, पीकर भी जीया जाता है।
ढाई आखर बांच-बांच तुम , ज्ञानी ही तो कहला ओगे।
सहज सांसों का आना-जाना गिन-गिन सांसें न ले पाओगे।
मिलन की किंचिंत आस ना हो, बतलाओ कैसे जी पाओगे।।
धरती आकाश सागर की गहराई, संभव है तुम नाप सको।
कलम कागज धर हृदय सागर में, कभी उतर ना पाओगे।।
अधरों का छुअन ना आलिंगन, प्रेमपाश ना बंध पाओ।
नैनों से झर-झर नीर बहे,स्वाति बूंद भी ना तुम पाओ।।
तब गीत ऐसा लिख जाना,नित नूतन चिरन्तन शास्वत हो।
शब्द व्यंजना के हे कुशल चितेरे ,वो दर्द कहां से लाओगे।।
रोशन साहू मोखला (राजनांदगांव)
7999840942
