साल में एक बार मंदिर से निकलकर भक्तों के बीच आते हैं और 9 दिनों तक अपने भक्तों के साथ भ्रमण करते हैं जगन्नाथ जी के रथ यात्रा को लेकर पौराणिक कथाओं में मान्यता है कि जगन्नाथ जी की बहन सुभद्रा जी ने उनसे एक बार द्वारिका दर्शन की इच्छा जाहिर की थी और तब जगन्नाथ जी ने अपनी बहन को रात में बिठाकर ब्राह्मण कराया था तब से ही रथ यात्रा की शुरुआत हुई थीजगन्नाथ जी के रथ को नदी घोष बलभद्र जी के रथ को कल ध्वज एवं सुभद्रा जी के रात को दर्पण डालना कहा जाता है जगन्नाथ जी के रथ में 16 बलभद्र जी के रथ में 14 एवं सुभद्रा जी के रथ में 12 पहिए होते हैं जगन्नाथ जी के रथ को बनाने में 18832 बलभद्र जी के रथ को बनाने में 763 एवं सुभद्रा जी के रात को बनाने में 553 लकड़ी के टुकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है जगन्नाथ जी के रथ की ऊंचाई 44.02 फीट बलभद्र जी के रथ की ऊंचाई 43.003 फीट एवं सुभद्रा जी के रथ की ऊंचाई 42.02 फीट होती है व्रत को बनाने में कभी भी कल या लोहे अथवा किसी भी धातु का इस्तेमाल नहीं किया जाता रात को बनाते वक्त लकड़ी काटने के लिए पहली वार सोने की हथौड़ी से लगाया जाता है रात को खींचने के लिए नारियल के राशियों का इस्तेमाल होता है रात को बनाने में लगभग 2 महीने का समय लगता है इस दौरान रथ को बनाने वाले कारीगर दिन में सिर्फ एक बार ही सादा भोजन ग्रहण करते हैं पुराने और धार्मिक ग्रंथो में मान्यता है कि जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का फलसा योग्य के फल के बराबर है रथ की रस्सी को छूने मात्र से ही पापों का छह होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है यही वजह है कि रथ यात्रा में हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पूरी पहुंचते हैं जगन्नाथ जी के रथ को हर वर्ष नया बनाया जाता है जगन्नाथ जी के रथ के अभिभावक गरुड़ बलभद्र जी के रथ के अभिभावक वासुदेव एवं सुभद्रा जी के रथ के अभिभावक
