आयोजक: हिंदी विभाग, श्री रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय, रायपुर
तिथि: 10 जनवरी 2026
दिनांक 10 जनवरी 2026 को श्री रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय के कला संकाय के हिंदी विभाग द्वारा “हिंदी भाषा की यात्रा : लोक से विश्व तक” विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा के ऐतिहासिक महत्व, लोकजीवन से उसके गहरे संबंध, वैश्विक स्तर पर उसके विस्तार तथा समकालीन परिदृश्य में उसकी भूमिका पर गंभीर विमर्श करना था।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सौरभ चतुर्वेदी ने हिंदी भाषा पर केंद्रित इस संगोष्ठी का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसी अकादमिक संगोष्ठी हिंदी भाषा और साहित्य के विविध आयामों को समझने का सशक्त माध्यम हैं। कार्यकारी निदेशक प्रो. शुभाशीष भट्टाचार्य ने हिंदी के कुछ विशिष्ट शब्दों का उल्लेख करते हुए उनके अनुवाद के स्थान पर उनकी मौलिकता और सांस्कृतिक विशिष्टता को संरक्षित रखने पर बल दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रावतपुरा सरकार लोककल्याण ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी निदेशक श्री विशाल गर्ग ने की तथा हिंदी भाषा की सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता पर अपने विचार व्यक्त किए। अतिथि वक्ताओं के सम्मान उपरांत प्रो. एन. पी. यादव ने अपने आशीर्वचनों से कार्यक्रम को दिशा प्रदान की। मंच पर शैक्षणिक कला संकाय अध्यक्ष प्रो. विजय सिंह भी मौजूद थे।
संगोष्ठी के प्रथम वक्ता प्रख्यात कथाकार श्री कैलाश बनवासी ने हिंदी साहित्य में लोक की भूमिका पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वास्तविक लोक सामान्य जनजीवन की जीवनधारा से शक्ति ग्रहण करता है। मुख्यवक्ता प्रो. सियाराम शर्मा ने हिंदी भाषा के ऐतिहासिक संघर्षों पर सारगर्भित व्याख्यान दिया और हिंदी के विकास-क्रम को सामाजिक आंदोलनों से जोड़कर प्रस्तुत किया। इसके पश्चात छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. कप्तान सिंह ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अपने विचार प्रकट किए।
इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से 110 विषय विशेषज्ञों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने पंजीयन कराया, जिसमें आयोजित दो तकनीकी सत्रों में 25 शोधार्थियों ने ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। प्रस्तुत शोधपत्रों में हिंदी भाषा, लोकसंस्कृति, वैश्वीकरण और समकालीन चुनौतियों जैसे विषयों पर गहन विमर्श देखने को मिला।
संगोष्ठी के अंतर्गत एक पैनल चर्चा सत्र का भी आयोजन किया गया, जिसमें अतिथि विद्वानों ने हिंदी साहित्य में लोकज्ञान परंपरा के स्वरूप पर विचार प्रस्तुत किए। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. एन. पी. यादव थे, जिनके साथ प्रो. सियाराम शर्मा ने मंच साझा किया। प्रो. ओमप्रकाश भारती ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़ते हुए कहा कि ‘लोक’ केवल ग्रामीण या अशिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शहरी निम्न एवं मध्यमवर्गीय समाज के अनुभव और ज्ञान भी समाहित हैं। अंतरराष्ट्रीय वक्ता के रूप में हंगरी से जुड़े हिंदी लेक्चरर श्री पीटर सेगी ने अपने व्याख्यान में वैश्विक स्तर पर हिंदी की प्रबल उपस्थिति और बढ़ते साख को रेखांकित किया ।
इस संगोष्ठी की संयोजक हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. पायल ने कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा पर प्रकाश डाला। मंच संचालन प्रथम सत्र में डॉ. चित्रा पांडेय एवं डॉ. आशीष कुमार तिवारी ने किया, जबकि पैनल चर्चा सत्र का संचालन संगोष्ठी के सह-संयोजक डॉ. नरेश कुमार गौतम ने किया। समापन सत्र का संचालन एम.ए. हिंदी की छात्रा तृप्ति शर्मा ने किया। संगोष्ठी की उपलब्धियों पर कला संकायाध्यक्ष प्रो. मनीष कुमार पाण्डेय ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह आयोजन हिंदी भाषा को अकादमिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नई दिशा देने वाला सिद्ध होगा। उक्त कार्यक्रम में आयोजन समिति के सभी सदस्यों के साथ विश्वविद्यालय परिवार के प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की ।
राष्ट्रगान के साथ इस गरिमामय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल समापन हुआ।