श्रीमती अनुप्रिया पटेल
बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली से आर्थिक उत्पादकता बढ़ती है, कार्यबल की संख्या में बढ़ोतरी होती है और विकास दीर्घावधि तक होता है। इसलिए, अच्छी सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा संकेत है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति भी है। यह वह आधार है, जिस पर मानवीय क्षमता का निर्माण होता है और देश की ताकत मापी जाती है। इसलिए, बेहतर सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति है और इसमें लगाया गया हर रुपया देश के लोगों में किया गया निवेश है।
इस तरह, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) , यानी यह सुनिश्चित करना कि सभी लोग, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, बिना किसी आर्थिक परेशानी के, जब और जहाँ ज़रूरत हो, अच्छी गुणवत्ता की सभी ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल कर सकें। यह न केवल 2030 तक हासिल किया जाने वाला सतत् विकास का लक्ष्य है, बल्कि सेहत से जुड़ी एक प्राथमिकता भी है।
भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (एनएचपी 2017), सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) और एसडीजी 3 को हासिल करने के लक्ष्य के अनुरूप है और यह एक सरल लेकिन मज़बूत सोच पर आधारित है – स्वास्थ्य सेवाओं तक हर व्यक्ति की पहुँच होनी चाहिए। इसके चार स्तंभ, किफायती होना, पहुँच, गुणवत्ता और उपलब्धता , उस सोच को वास्तिवकता में बदलते हैं और जीवन के सभी चरणों में देखभाल की एक व्यापक व्यवस्था को मज़बूत करते हैं। लक्ष्यों के अनुरूप, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन राज्यों को स्वास्थ्य प्रणाली का एक एकीकृत तीन-स्तरीय मॉडल प्रदान करने में मदद करता है, जिसमें ग्रामीण और शहरी इलाकों (कमज़ोर वर्गों सहित) के बीच दोतरफा रेफरल लिंक शामिल हैं।
आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) प्राथमिक स्तर पर बीमारी से बचाव, सेहत को बढ़ावा देने, इलाज, पुर्नवास और प्रशामक देखभाल जैसी व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं। ईसंजीवनी टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म इन एएएम के ज़रिए समुदाय को विशेषज्ञों से जोड़कर विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। साथ ही, एक खास टेली-मानस प्लेटफ़ॉर्म भी है, जिसने अब तक कुल 38.93 लाख लोगों तक पहुँच बनाई है।
एएएम से जुड़े द्वितीय स्तर के केंद्र जैसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी)/प्रथम रेफरल इकाई (एफआरयू) और ज़िला अस्पताल (डीएच) होते हैं, जो विशेषज्ञ के समक्ष इलाज और अस्पताल में भर्ती होने की सुविधा के लिए रेफरल का पहला ज़रिया होते हैं। वहीं, मेडिकल कॉलेज जैसे तृतीयक संस्थान सबसे ऊपर होते हैं और ज़्यादा जटिल व सुपर-स्पेशलिस्ट सेवाओं की ज़रूरतें पूरी करते हैं।
इस तीन-स्तरीय प्रणाली को सरकारी स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी का समर्थन प्राप्त है। पिछले दशक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर होने वाला खर्च 168% बढ़ गया है, जो स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानने के सरकार के संकल्प को दर्शाता है।
आयुष्मान आरोग्य मंदिर का सफ़र व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के विस्तार और प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही से समस्या होने से पहले ही ध्यान रखने वाली देखभाल की ओर ज़रूरी बदलाव को दिखाता है। व्यापक स्वास्थ्य पैकेजों की संख्या 6 से बढ़ाकर 12 करना, भारत की बदलती आबादी और बीमारियों के बदलते पैटर्न के हिसाब से उठाया गया एक ज़रूरी कदम है। बढ़ती उम्र की आबादी और गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते मामलों की दोहरी चुनौतियों का सामना करते हुए, इसके दायरे में गैर-संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल, आपातकालीन सेवाएँ, आँख, कान-नाक-गला (ईएनटी) और मुँह की सेहत के साथ-साथ योग और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ शामिल हैं। यह सब उस आबादी की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो भारत अब बन रहा है।
मई 2026 तक, देश भर में 1.8 लाख से ज़्यादा एएएम काम कर रहे हैं, ताकि लोगों को उनके घर के पास स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें। इस विस्तार का असर एएएम में 120 करोड़ से ज़्यादा ओपीडी परामर्श, 70 करोड़ से ज़्यादा ईसंजीवनी टेली-परामर्श और अच्छी सेहत व कल्याण को बढ़ावा देने वाले 46.1 करोड़ से ज़्यादा वेलनेस सत्रों में साफ़ दिखता है।
प्राथमिक देखभाल स्तर पर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और आम कैंसर (जैसे ओरल, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर) के लिए आबादी-आधारित स्क्रीनिंग 30 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वयस्कों के लिए की जाती है, जिससे बीमारी का जल्दी पता लगाना एक सामान्य प्रक्रिया बन जाती है। यह जांच ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ के तहत सेवा वितरण का एक अहम हिस्सा है, जो एनसीडी की रोकथाम को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करती है। एनसीडी सेवाओं का विस्तार बीमारी का जल्दी पता लगाने, रोकथाम, प्रबंधन और इलाज के लिए एक बहु स्तरीय प्रयास है। समर्पित एनसीडी क्लीनिक, डे-केयर कैंसर केंद्र , तृतीयक देखभाल कैंसर केंद्र और राज्य कैंसर संस्थान, उन्नत ऑन्कोलॉजी सेवाओं को विकेंद्रीकृत करते हैं और विशेषज्ञ देखभाल को मरीज़ के करीब लाते हैं।
साथ ही, बचाव से जुड़ी गतिविधियों के लिए ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाया जाता है। एफएसएसएआई स्वस्थ खान-पान की आदतों को बढ़ावा देता है, ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है और आयुष मंत्रालय योग और कल्याण को आगे बढ़ाता है। लगातार चलने वाले जन-जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य दिवस मनाने जैसे कार्यक्रम इन प्रयासों को और मज़बूत करते हैं। खाने के तेल की खपत को 10% कम करने की प्रधानमंत्री मोदी की निजी अपील एक सरल लेकिन दमदार सोच को ज़ाहिर करती है कि एनसीडी के ख़िलाफ़ लड़ाई अस्पतालों के साथ-साथ घरों में भी जीती जाती है।
प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के विस्तार के लिए, एएएम स्तर पर ‘सामुदायिक स्वास्थ्य ऑफिसर्स’ का एक नया कैडर शुरू किया गया, जिससे क्लिनिकल और जन स्वास्थ्य से जुड़ी विशेषज्ञता समुदायों के और करीब आ गई। यह विस्तार लोगों के घर-द्वार तक भी पहुँचा, जहाँ फ्रंटलाइन नेटवर्क बढ़कर 10 लाख से ज़्यादा आशा (आशा) कार्यकर्ताओं तक पहुँच गया, जिन्होंने समुदाय को स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ा।
विस्तार के साथ-साथ, भारत ने देखभाल के मापदंडों को बदलने की ज़्यादा मुश्किल चुनौती भी स्वीकार की। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक, जो देश में ही विकसित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणीकृत हैं, ने गुणवत्ता को सिर्फ़ एक इच्छा से बदलकर एक जवाबदेही बना दिया। 65,000 से ज़्यादा जन स्वास्थ्य केंद्र, जिनमें 54,926 आयुष्मान आरोग्य मंदिर शामिल हैं, अब एनक्यूएएस द्वारा प्रमाणीकृत हैं। इसके अलावा, आईपीएचएल के लिए लैब मानकों ने व्यवस्था में और मज़बूती और सटीकता लाई है।
एनक्यूएएस की सफलता का राज़ सिर्फ़ मानदंड नहीं, बल्कि उसके आस-पास बनी व्यवस्था था, जैसे माँ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए ‘लक्ष्य’, साफ़-सफ़ाई और संक्रमण नियंत्रण के लिए ‘कायाकल्प’ और बच्चों की सेहत के लिए ‘मुस्कान’। इन सभी ने मिलकर गुणवत्ता को सिर्फ़ एक मानक के बजाय एक आधारभूत स्तर बना दिया है। नतीजा यह है कि अब ऐसी व्यवस्था तैयार हुई है, जिसमें न सिर्फ़ ज़्यादा लोगों का इलाज होता है, बल्कि बेहतर इलाज भी किया जाता है।
अगर प्राथमिक देखभाल व्यवस्था का पहला वादा है, तो राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम जैसे खास कार्यक्रम देश भर में ओओपीई को कम करने के सरकार के संकल्प को और दिखाते हैं। इससे उन परिवारों की कुल मिलाकर 10,102 करोड़ रुपये से ज़्यादा की बचत हुई है, जिन्हें वरना यह बोझ अकेले उठाना पड़ता।
लोगों की सेहत की ज़िम्मेदारी लोगों को ही सौंपते हुए, भारत ने अपने सामुदायिक मंचों को मज़बूत किया है। यह एक सोच-समझकर बनाया गया, विकेंद्रीकृत ढांचा है, जो योजनाकृत, निगरानी और जवाबदेही को स्थानीय लोगों के हाथों में सौंपता है। विलेज हेल्थ, सैनिटेशन एंड न्यूट्रिशन कमिटीज़ (वीएचएसएनसी), जन आरोग्य समितियां (जेएएस) और रोगी कल्याण समितियां (आरकेएस) ने पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय भागीदार बनाया है। शहरी इलाकों में, महिला आरोग्य समितियां (एमएएस) पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसेमंद प्रतिक्रिया के लिए समुदाय की आवाज़ को अहमियत देते हुए, महिलाओं को सामुदायिक आउटरीच के केंद्र में रखकर इस फ़ोकस को और गहरा करती हैं।
वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ है आज के खतरों के साथ-साथ कल के खतरों के लिए भी तैयार रहना। 2021 में 64,180 करोड़ रुपये के बजट के साथ शुरू की गई पीएम-एबीएचआईएम योजना सीधे तौर पर कोविड-19 से मिले सबक पर आधारित है, जैसे कि अचानक बढ़ने वाली ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता बनाना, लेबोरेटरी नेटवर्क को मज़बूत करना, बीमारियों की वास्तविक समय में निगरानी का दायरा बढ़ाना और ‘वन हेल्थ’ शोध ढ़ांचा विकसित करना। असल में, यह मुश्किल समय से मिले सबक को एक मज़बूत जन स्वास्थ्य प्रणाली में बदलने का काम है।
जब बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत पड़ती है, तो आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई आर्थिक मदद प्रदान करता है, जिससे इलाज का खर्च परिवार के लिए भारी बोझ नहीं बनता। दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना होने के नाते, यह हर परिवार को हर साल द्वितीय और तृतीयक देखभाल के लिए 5 लाख रुपये तक की सुविधा देती है। यह सुरक्षा 2024 में 70 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को भी दी गई, चाहे उनकी आय कुछ भी हो।
इन सभी पहलों के पीछे एक डिजिटल आधार है, जिसके बिना इतने बड़े पैमाने पर व्यवस्था काम नहीं कर सकती। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत आभा आईडी, अंतर सचालित स्वास्थ्य जानकारी और यूनिफाइड हेल्थ इंटरफेस ने रिकॉर्ड को पोर्टेबल, पहुंच को आसान और सेवाओं के वितरण को और बेहतर बना दिया है। भारत की डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली की ओर बढ़ने के साथ ही अब तक लगभग 91 करोड़ आभा आईडी बनाई जा चुकी हैं।
कुल मिलाकर, मुफ्त सेवाएं, सामुदायिक स्तर पर निदान, अग्रिम पंक्ति के विशेषज्ञ, रेफरल परिवहन, डायलिसिस, अस्पताल में भर्ती होने का खर्च और एक डिजिटल आधार, केवल योजनाओं का संग्रह नहीं हैं, बल्कि ये एक प्रणाली का निर्माण करते हैं। लिहाज़ा ये स्वास्थ्य संबंधी लाभ आकस्मिक नहीं हैं। ये सतत्, कई स्तरों पर किए गए सार्वजनिक निवेश का कारगर परिणाम हैं।
ये नतीजे अब अमूर्त नहीं हैं, वे भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। मातृ मृत्यु दर 2004-06 में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 254 से घटकर 2022-24 में 87 हो गई है, जो एनएचपी 2017 के लक्ष्यों को पूरा करती है। 1990 से 2024 तक, भारत ने एमएमआर में 84% की कमी की है, जो वैश्विक स्तर पर 48% की गिरावट से लगभग दोगुनी है और इसी वजह से मातृ स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में नेतृत्व के लिए यूएनएफपीए की मान्यता प्राप्त की है। व्यापक तस्वीर भी यही कहानी बयां करती है: नवीनतम एनएफएचएस के अनुसार, प्रजनन दर 2.0 तक पहुंच गई है, संस्थागत प्रसव 90.6% तक बढ़ गए हैं और पूर्ण टीकाकरण अब 98.6% है। ये एक ऐसी प्रणाली के संकेत हैं, जो रोकथाम, पहचान और प्रतिक्रिया करना सीख रही है। यही कारण है कि भारत की उन्मूलन उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं: 2015 में मातृ एवं नवजात टेटनस और 2024 तक ट्रेकोमा का सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में उन्मूलन। ऐसा करने वाला भारत दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन गया है।
यह व्यापक सबक है। एनएचपी 2017 ने दिशा निर्धारित की, एनएचएम ने उप-स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर तृतीयक अस्पतालों तक वितरण अवसंरचना का निर्माण किया और आयुष्मान भारत ने उस प्रणाली को उसके चार कार्यशील स्तंभ दिए: प्राथमिक देखभाल के लिए एएएम, वित्तीय सुरक्षा के लिए पीएम-जेएवाई, सशक्तिकरण और अवसंरचना के लिए पीएम-एबीएचआईएम, और डिजिटल आधार के लिए एबीडीएम। मुफ्त दवाओं, निदान, परिवहन और डायलिसिस के साथ मिलकर, ये योजनाएँ मात्र योजनाओं का संग्रह नहीं हैं। ये हमारे लोगों के लिए एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य कवच का निर्माण करती हैं और यह याद दिलाती हैं कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण के रूप में देखा जाता है, तो यह जीवन और देश के भविष्य दोनों को बदल सकता है।
