कोई अपना शोषण, अपमान, तिरस्कार और कदाचार कब तक बर्दाश्त करेगा? इंसान आज इंसान नहीं शैतान और हैवान होता जा रहा है। मानवता खत्म हो गई है और अब ढोंग और पाखंड चल रहा है। मनुष्य तो क्या पशु, पक्षी, जीव, जन्तु यहां तक जो हम पानी पीते हैं, वह भी अपनी बेइज्जती से त्रस्त है। खुलेआम अपना चीरहरण होते देख वह रसातल गमन करने की तैयारी में है। कोई रखवाला नहीं। इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ी में पढ़ें यह आलेख…
ओ दिन अइसने लिखत-पढ़त रेहेंव ततके बेर नाती बुजा कोन कोती ले आगे अउ लिखे रेहेंव तउन हेडिंग ल पढ़ डरथे। पूछथे- बबा, ये का पानी के चीरहरन?
ओला बताथौं- हां बेटा, पानी के चीरहरन!
नाती कहिथे- फेर दाई तो बताये रिहिसे के द्रौपदी नांव के एक झन महारानी रिहिसे तउन ला जुआ मं जब पांडव मन हारगे रिहिसे तब ओला राजमहल ले ओकर चूंदी ल धर के घिरलावत दुशासन हा राजदरबार मं लाय रिहिसे। अपन बड़े भाई दुरजोधन के आदेश पाके द्रौपदी के चीरहरन करते रिहिसे। फेर ये मेर पानी के चीरहरन के बात मोर मगज मं नइ बइठत हे।
नाती ल कहिथौं- बेटा ये पानी के चीरहरन के बात अउ घटना द्रौपदी के चीरहरन ले अउ जबर हे। द्रौपदी ओ समे अतेक चिखिस, चिल्लाइस, छटपटइस, रुदन करिस फेर ओ राजसभा मं बइठे बड़े-बड़े राजदार, ओकर परिवार के मुखिया, गुरु, कोनो कनमटक नइ दीन अउ दुशासन द्रौपदी के लुगरा (साड़ी) ल खींचते रिहिसे, कइसनो करके एहर नग्न हो जाय। फेर बेटा… जाको राखे साइंया, मार सके न कोय, कस भगवान किसन कन्हइया जब द्रौपदी के दुख भरे आवाज अउ कलपत बानी ल सुनके दउड़े चले आइस। अउ ओकर लाज बचा लिस। सबो झन अंचभिंत रहिगे, केहे लगिन ये कइसे होगे। शकुनि के चाल फेल होगे?
नाती फेर चेंधत पूछथे- ये सब तो ठीक हे बबा, अतका कथा ल तो मैं अपन दाई के मुख ले सुन डरे हौं, तैं कोनो नवा कहिनी बतावत हस? मैं जउन जानना चाहत हौं, ये जउन पानी के चीरहरन के हेडिंग लिखे हस तेन अउ कोनो दूसर महाभारत के कथा हे का? ये कथा लतो दाई हा मोला कभू नइ सुनाय हे?
ठंउका लिखे-पढ़े के बेरा ये नाती बुजा साले हा कहां ले आगे रे, भेंगराजी डार बर। बने सोच समझ के कागज-कलम धर के मइया सरसती के सुमरन करत रेहेंव- तोला अभिच्चे आना रिहिसे रे बुज्जरी, बने लिख-पढ़ डरे रहितेंव तब आते। बातचीत मं धियान छरिया जथे मुर्रा लाड़ू कस। अउ टरत घला नइ बुजा हा, जिद करत हे, पूछत हे काये पानी के चीरहरन, कोन करत हे। अउ कोनो दुरजोधन, दुशासन अउ शकुनि जन्म लेके ये धरती मं आगे हे का?
समझाथौं, बेटा, अभी ये तीर ले जा। लिखे-पढ़े के बेरा मं भेंगराजी नइ डारे जाए, लिख लेहूं तहां ले तोला बता दुहूं। नाती-बबा के बीच के गोठबात कुरिया मं रिहिस तउन बहू सुन डरिस धन का? ओहर बेटा ल हूद करावत कहिथे- रामलाल बेटा, बबा ल बेंझा झन। चल एती आव, अउ जा नहा-धो। बासी खाके पढ़े-लिखे ले बइठ। जिमी कांदा के बने अमसुर साग हे। तोर ददा खाके अभी गिसे खातू पाले बर।
अपन दाई के कड़क आवाज ल सुनिस तहां ले चुपचाप बबा करा ले खसक लीस। कांही गतर नइ चलिस।
अब एती मोर मति तो छरियागे राहय तभो ले धीर लगाके एकजाई करेंव। सोचेंव- कोन करा बात शुरू करिहौां कइके मन मं बिचारे रेहेंव। झटकिन सुरता तो घला नइ आय ले धरत हे। कलम-कागज ल जेने-मेरे के तेने मेर छोड़के दुआरी पार निकलके् आगेंव तब देखथौं, पहाटिया कांवर मं पानी धर के आवत रिहिस। दू-तीन कांवर पानी तो रोज पीये बर लगथे घर मं। सुरता आगे पानी… पानी… पानी…?
दिमाग दउडग़े। अपन कलम-कागज ला पकड़ेंव अउ उत्ता-धुर्रा लिखना शुरू कर देंव। सचमुच मं पानी आज थर्रागे हे, ओकर वइसने हाल होगे हे जइसन कोनो दुखियारी बहिनी, बेटी, महतारी मन के होथे। पानी के कोनो कदर नहीं। सब जानथे- बिना पानी सब सून, तब ले घर के मुरगी दार बरोबर। अत्याचार, अनाचार, लांछन, दुरदशा कोन कतेक ल सइही। सब काम आवत हे, सबके काम आवत हे, सब ला सुख देवत हे, एकर बदला मं ओला मिलत का हे।
पानी एक दिन अब दुखड़ा बतावत कहिथे- तोला अपन दुख ला का बतावौं बबा, अब तो मोर इज्जत ला सरेआम बेचे बर सब उतारू होगे हे। जलाशय, बांध, नदिया, नरवा, ढोंडग़ा के पानी ला घला बेचे ले धर ले हें। मोर आतमा कलपत हे बबा, मैं कहां जाके रेल मं कट जांव, आगी लगा के मर जांव। हाय पइसा… हाय पइसा… धन बटोरे के लोभ मं सरेआम मोर इज्जत ला बेचे ले धर लें हे। का मैं रंडी हौं, वेश्या हौं, कोठा मं नचइया तवायफ हौं?
पानी कलपत अउ आंखी डाहर ले आंसू ढारत कहिथे- बबा, ओ द्रौपदी के इज्जत तो भगवान किसन कन्हइया आके बचा लिस, मोर कोनो रखवार नइ दीखत हे? अब तो एके रस्दा दीखत हे बबा- जइसे सीता मइया दुख ला सहे नइ सकिस तब धरती माता करा हाथ जोर के विनती करथे- दाई मोला तोर गोदी मं समा ले ओ। बेटी के विनती ला सुनके धरती मां जइसे ओला जघा दीस अउ ओहर ओकर गोदी मं समागे। तइसने महूं बिपत के मारे हौं।
बबा ला ओहर बताथे- ये धरती मं सब दुरयोधन, दुशासन अउ शकुनि हे बबा। का गांव लेबे, का शहर। गली-गली मं सांड बरोबर गिंजरत हे। कोनो बहिनी, बेटी, बहू, महतारी के इज्जत नइ बाचत हे। झिमझाम दीखत हे तब जइसे मुसुआ ला देखते साठ बिलई झपट परथे, उही हाल होगे हे। मोर तो बेकदरी होवत हे। उही पाके महूं अपन ठउर ला छोड़ के रसातल मं जाथौं। सुरता कर-कर के छटपटाही, पानी… पानी… तब अपन करनी के सुरता आही… रोही-गाही।
